एक्सीडेंट से पहले चेतावनी! नई कारों में लगेगा V2V Communication चिप
भारत की सड़कों पर हर साल लाखों हादसे होते हैं और इनमें सबसे दुखद बात यह है कि कई दुर्घटनाएँ “एक सेकंड पहले” चेतावनी मिल जाए तो टल सकती हैं। अब सरकार उसी “एक सेकंड” को टेक्नोलॉजी से खरीदने की तैयारी में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2026 के अंत तक नई गाड़ियों में Vehicle-to-Vehicle सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से अनिवार्य किया जा सकता है, जिसमें प्रति वाहन लगभग ₹5,000–₹7,000 तक अतिरिक्त लागत आने की संभावना बताई गई है।
यह सिस्टम इंटरनेट पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि रेडियो सिग्नल्स के जरिए आसपास की गाड़ियों से रियल-टाइम डेटा साझा करेगा—जिससे अचानक ब्रेकिंग, सामने खड़े वाहन, ब्लाइंड स्पॉट या कम विजिबिलिटी जैसी स्थितियों में ड्राइवर को तुरंत अलर्ट मिल सके।
2026 के प्लान में क्या है नया?
सरकारी बयानों/रिपोर्ट्स के मुताबिक, रोड ट्रांसपोर्ट और हाईवे मंत्रालय (MoRTH) इस टेक्नोलॉजी के स्टैंडर्ड्स ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) के साथ मिलकर फाइनल कर रहा है। स्टैंडर्ड तय होने के बाद नोटिफिकेशन के जरिए इसे पहले नई गाड़ियों पर लागू किया जा सकता है और आगे चलकर पुरानी गाड़ियों में रेट्रोफिट का रास्ता भी खोला जा सकता है।
कीमत क्यों बढ़ेगी?
क्योंकि हर वाहन में एक On-Board Unit (OBU)/डिवाइस लगेगा जो आसपास की गाड़ियों से सिग्नल/मैसेज एक्सचेंज करेगा। इसी हार्डवेयर + इंटीग्रेशन की वजह से ₹5–7 हजार तक बढ़ोतरी का अनुमान रिपोर्ट्स में आया है।
V2V communication आखिर है क्या, और यह कैसे काम करेगा?
सिंपल भाषा में समझें: आपकी कार “देख” नहीं पाती कि आगे वाली कार ने अचानक ब्रेक क्यों लगाया, या मोड़ के पीछे क्या है। लेकिन अगर आगे वाली कार आपके साथ तुरंत “बोल” दे—कि मैंने हार्ड ब्रेक लगाया, मेरी स्पीड गिर रही है, मैं इस लोकेशन पर हूँ—तो आप समय रहते प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
इंटरनेट के बिना भी अलर्ट कैसे?
रिपोर्ट्स के अनुसार यह सिस्टम मोबाइल नेटवर्क में जाए बिना रेडियो सिग्नल्स से काम करेगा, ताकि पहाड़ी इलाकों/हाईवे/कम नेटवर्क वाली जगहों पर भी अलर्ट मिल सके।
स्पेक्ट्रम किसके जरिए मिलेगा?
खबरों के मुताबिक Department of Telecom (DoT) ने V2V के लिए 30 MHz (5.875–5.905 GHz) स्पेक्ट्रम के उपयोग पर सैद्धांतिक सहमति दी है। यह वही बैंड है जिसे कई जगह ITS (Intelligent Transport Systems) में उपयोग किया जाता है।
किन हादसों में सबसे ज्यादा फायदा मिल सकता है?
सरकारी/मीडिया रिपोर्ट्स में जिन यूज़-केसेस का जिक्र है, उनमें ये स्थितियाँ सबसे अहम हैं:
1) अचानक ब्रेकिंग और रियर-एंड टक्कर
अगर आगे वाली गाड़ी अचानक ब्रेक लगाए, तो पीछे वाली गाड़ी को सेकंडों में चेतावनी मिल सकती है।
2) रोडसाइड खड़े वाहन/स्टेशनरी ऑब्जेक्ट
हाईवे पर कई बार ट्रक/कार साइड में खड़ी होती है, रात/कोहरे में दिखती नहीं—ऐसी स्थिति में सिस्टम “स्टेशनरी वाहन आगे” अलर्ट दे सकता है।
3) ब्लाइंड स्पॉट और आसपास की गाड़ियों की मौजूदगी
रिपोर्ट्स के मुताबिक सिस्टम स्पीड, लोकेशन, एक्सेलेरेशन, ब्रेकिंग और ब्लाइंड स्पॉट जैसी जानकारी साझा कर सकता है।
4) “डार्क स्पॉट”/कम विजिबिलिटी जोन
कम रोशनी, मोड़, ढलान, या धुंध—जहाँ आंखें धोखा खा जाती हैं—वहाँ रियल-टाइम अलर्ट उपयोगी हो सकता है।
क्या यह ADAS की तरह है? या अलग?
ADAS (जैसे AEB, Lane Assist, Adaptive Cruise) आपकी कार के कैमरा/रडार/सेंसर के आधार पर काम करता है। लेकिन V2V communication “दूसरी गाड़ियों के डेटा” को भी शामिल करता है—यानि यह सिर्फ आपकी कार की नजर नहीं, पूरे ट्रैफिक की “कॉमन समझ” बनाने की दिशा में कदम है। साथ ही सरकार रोड सेफ्टी के कई उपायों पर समानांतर काम करने की बात भी कर रही है—जैसे सेफ्टी नॉर्म्स, Bharat NCAP, और अन्य सुधार।
सरकार किस टाइमलाइन की बात कर रही है?
कई रिपोर्ट्स में रोड ट्रांसपोर्ट मंत्री के हवाले से एंड-2026 तक रोलआउट/मैंडेट की दिशा में काम होने की बात आई है, और स्टैंडर्ड फाइनल होते ही चरणबद्ध नोटिफिकेशन की तैयारी बताई गई है।
क्या यह पुराने वाहनों पर भी लागू होगा?
रिपोर्ट्स के अनुसार शुरुआत में इसे नई गाड़ियों के लिए अनिवार्य किया जा सकता है और बाद में रेट्रोफिट की व्यवस्था लाने की बात कही गई है।
एक्सपर्ट सलाह: टेक्नोलॉजी आएगी, लेकिन “ड्राइवर की जिम्मेदारी” नहीं घटेगी
यहाँ सबसे जरूरी बात—यह सिस्टम आपकी मदद करेगा, आपकी जगह ड्राइव नहीं करेगा। रोड-सेफ्टी एक्सपर्ट्स और ट्रैफिक इंजीनियरिंग की सामान्य समझ यही कहती है कि नई सेफ्टी टेक अपनाते वक्त ये 6 बातें जरूरी हैं:
1) अलर्ट को “इन्फो” समझें, “फैसला” नहीं
V2V communication से मिलने वाला अलर्ट समय बचाएगा, लेकिन अंतिम निर्णय आपकी स्पीड, रोड कंडीशन और आसपास की वास्तविक स्थिति देखकर ही लें।
2) सेफ डिस्टेंस का नियम कभी न तोड़ें
टेक्नोलॉजी सबसे पहले “समय” देती है; अगर आपने पहले से ही टेलगेटिंग कर रखी है, तो अलर्ट भी देर हो सकता है।
3) बारिश/कोहरे में स्पीड को सिस्टम के भरोसे न छोड़ें
कम विजिबिलिटी में ब्रेकिंग डिस्टेंस बढ़ता है—यह फिजिक्स है। V2V communication मदद करेगा, लेकिन मौसम के नियम नहीं बदल सकता।
4) ओवरकॉन्फिडेंस सबसे बड़ा रिस्क
नई गाड़ी में सेफ्टी फीचर होने पर कुछ लोग तेज चलाने लगते हैं—यही सबसे खतरनाक आदत है।
5) अपडेट्स, सर्विस और फिटमेंट क्वालिटी पर ध्यान दें
OBU/मॉड्यूल, एंटीना, सॉफ्टवेयर—सबका सही तरह से काम करना जरूरी है। सर्विस के दौरान “फॉल्ट/वार्निंग” को इग्नोर न करें।
6) डेटा/साइबर सिक्योरिटी को भी गंभीरता से लें
क्योंकि यह कम्युनिकेशन सिस्टम है, इसलिए स्टैंडर्ड्स, टेस्टिंग और सिक्योरिटी प्रोटोकॉल मजबूत होना जरूरी होगा—यही कारण है कि सरकार पहले स्टैंडर्ड फाइनल कर रही है।
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आम खरीदार के लिए मतलब क्या निकलता है?
अगर आप 2026 के अंत/उसके बाद नई कार खरीदने की सोच रहे हैं, तो ये बदलाव आपके लिए 3 तरीके से मायने रखता है:
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सेफ्टी वैल्यू बढ़ेगी: हाईवे और इंटर-सिटी ड्राइविंग में रियल-टाइम चेतावनियाँ मिल सकती हैं।
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ऑन-रोड प्राइस थोड़ा बढ़ सकता है: ₹5,000–₹7,000 तक का अनुमान।
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फीचर-लिस्ट में नया “मस्ट-चेक” पॉइंट: क्या कार में V2V communication सपोर्ट है, किस स्टैंडर्ड पर है, और क्या भविष्य में अपडेट/कम्पैटिबिलिटी मिलेगी?
निष्कर्ष: 2026 का सेफ्टी अपग्रेड—टक्कर से पहले चेतावनी, जान बचाने की दिशा में बड़ा कदम
भारत में रोड सेफ्टी सिर्फ चालान या हेलमेट तक सीमित नहीं रह सकती—हाईवे, ट्रक ट्रैफिक, फॉग-बेल्ट और ओवरस्पीडिंग जैसी वास्तविकताओं के बीच टेक्नोलॉजी का रोल बढ़ना तय है। V2V communication इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है—जहाँ गाड़ियाँ एक-दूसरे को “पहले ही बता दें” कि खतरा सामने है।
और हाँ—यह सिस्टम जितना स्मार्ट होगा, उतनी ही स्मार्ट ड्राइविंग भी जरूरी है: स्पीड कंट्रोल, लेन डिसिप्लिन, और सेफ डिस्टेंस… क्योंकि आखिर में सबसे मजबूत सेफ्टी फीचर आपकी आदतें ही हैं।
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